Satsang notes morning (13aug 2021)
13 Aug
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते। तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति।।4.38।।।….
जो पहले नही थी बाद में भी नहीं होगा अभी भी नहीं के तरफ जा रहा है। फूल, शरीर का उद्धरण। उसको जाननेवाला तुम हो जो पहले था अभी है बाद में भी रहेगा।
वस्तु की बाहुल्यता, इच्छा अनुरूप जीवन से नहीं परंतु जो अभी जैसा है उसका का सदुपयोग करने से ही ज्ञान हो जाएगा कोई परिस्थिति बनाकर ईश्वर प्राप्त नहीं होगा।
खट खट में पानी पी लो प्रसंग। ऐसे ही संसार के चालू खटपट में अपना काम बनालो। इसहवार प्राप्ति कर लो।
सत्संग के बिना सेवा से संग का दोष आजाएगा।
निर्मानमोहा जितसङ्गदोषाअध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः। // द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्।।15.5।
सर्वभूत ….गयं विज्ञान …. न विपजेत मयी पुनः।
ज्ञानी विपत्ति में नहीं पड़ते। आता जरूर है पर उसे प्रभावित नहीं होते। अनुकूलता प्रतिकूलता का आना जीवन विकास के लिए जरूरी है।
दुःख की रेखा चित्त को मलिन कर देता है।
हमारे पास कितनी सामग्री है उसका मूल्य नहीं पर उस वस्तुओं का सदुपयोग का मूल्य । और वह मुक्ति के लिए पर्याप्त है।
तीर्थ नाहाये एक फल संत मील फल चार। सद्गुरु मिले अनंत फल कहत कवीर विचार। विश्लेषण।
यह भी देख वह भी देख ….
समर्थ रामदास की भिक्षा - किसान , और हक़ की खाने का प्रसंग
दिले तस्वीरे हैं यार जब गर्दन झुकाली मुलाकात कर ली।
नाहक के खाने से चित्त में नाहक की संकल्प विकल्प होता है।
मन तू ज्योति स्वरूप अपना मूल पिछान।
रामतीर्थ और बुड्ढा की प्रसंग। मन की एकाग्रता ।
बानी जहँसे निकलती वहां एकाग्र हो तो काम बयँ जाए।
मन की छोटी सी गलती आदत बनकर बड़ा हो जाता है। और जीवन को तबाह कर देता है।
Yv- अभ्यास से ही इष्ट की सिद्धी होती है।
अनात्म में आत्मबुद्धि का अभ्यास से संसार दृढ़ होता है।
13 Aug
अपनी मान्यता के अनुसार हम दूसरों को चलाना चाहते है इसलिय दुखी है… .
ज्ञान अग्नि बेकार कल्पना को जला देती हैं…
हम ब्रह्म ज्ञान नही पा सकते ये नकारात्मक सोच भर कर वैसा ही बन जाते है… .
मन कल्प वृक्ष है जेसा सोचते है वैसे बन जाते हैं…
बुड़िया का कोलसे बनाना और नारद जी का स्वर्ग प्रसंग…
जो अवस्था हमारे पास है उसका अनादर होता है और जो नही है, उस तरफ आकर्षण होता है, मुंह में दात प्रसंग…
जो पहले नही बाद में नही रहेगा, वो वर्तमान में भी नही की तरफ जा रहे है फिर उसका आकर्षण क्यु… .
जो ईश्वर, आत्मा पहले भी था, अभी भी है और शरीर के बाद भी रहेगा उस ईश्वर की ओर क्यु नही मन लगता…
अधिक और कम होने से कल्याण नही होता जो हमारे पास है उसका सदुपयोग होने से उसका मूल्य है… .
जितनी योगयता है उतना लगा दो…
घोड़े को चालू खटखट मे पानी पिलाना… .
संसार की खटपट मे अपना काम बना ले, बार बार ये सोचे कि ये संसार सपना है, जेसे आकाश निर्लेप है ऐसे मेरा आत्मा भी सर्व व्याप्त है उसमे कोई अच्छा बुरा नही… .
दयालू आदमी सेवा तो करता है पर सत्संग के अभाव मे संग दोष आ जाता है… .
सर्व भूत स्वच्छन्तो… . ग्यानी सब प्राणी के मित्र है…
अनुकूलता प्रतिकुलता विकास के लिए आती हैं… .
विषय मिलने से मन विकारों में गिरता है…
सुख आसक्ति की रेखा और दुख भय की रेखा खिच देता है..
जीवन मे सामग्री कितनी ह उसका मूल्य नही उसका सत उपयोग हो जाये तो कल्याण है… .
अनुकूलता का आकर्षण और प्रतिकुलता का डर मिट जाता हैं जब सबमें ईश्वर की लीला को देखते है….
यह भी देख वह भी देख, मिट जाये धोखा रह जाये एक…
समर्थ रामदास जी की किसान के भाइ के घर भिक्षा लेना और अन्न का असर ध्यान में मन लगा…
नाहक का खाने से मन अशांत, हक का खाने से मन शांत…
अपना स्वभाव मन खो देता है, तभी विकारों में गिरता है, मन तु ज्योती स्वरूप अपना मूल पीछान… .
आनंद एकाग्रता का होता है, शब्दों का नही… विवेकानंद जी का सत्संग प्रसंग… .
अभ्यास और वेराग से मन संयमी होता है… .
प्रारंभ छोटी गलती से होता है पर मन पर लगाम नही होने से वो बड़ी गलती का रूप ले लेता है…
अभ्यास से थककर उसे छोड़ें नहीं तो सफलता मिलेगी…
------कंट्रीब्यूटर 3
हरि ॐ 🙏
जो पहले नहीं होता है, वह बाद में भी नहीं रहेगा ...
तुम्हारे पास जितना है उसका सदुपयोग होने से उसका मूल्य है ..
सत्संग के बिना की गई सेवा ,संघ के रंग से रंग जाएगी, गलत संघ लग गया तो व्यक्ति में संघदोष आ जाएगा..
जो देह को मैं मान कर जीवन खराब नहीं करते वह व्यक्ति जीवन में उन्नति करता है ...
ज्ञानी सब प्राणियों के मित्र हैं विपत्तियों में नहीं पड़ते और अपने विवेक से सुख दुख को पहचानते हैं ....
विपत्ति और सत्संग हो तो विपत्ति छोटी हो जाती है ....
दुख आया है तो जाएगा, सुख आया है तो जाएगा ,जो सुख में प्रलोभित हो जाता है, वह दुख में भयभीत तो जाता है....
ब्रह्मज्ञानी के आगे जैसी कामना करते हैं ..वह संकल्प धीरे-धीरे पूरा हो जाता है...😌
रामदास व भिखारी का प्रसंग -
मन विकारों में ले जाता है उसे तरकीब से मोड़ा जाता है ..
प्रारंभ होता है छोटी गलती से ,मन पर रोक नहीं लगाई तो बड़ी गलती हो सकती है ...

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